Published on January 22, 2026 | Views: 381
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में देश भर के नजाने कितने शहीदों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी इन शहीदों में शहरों के अलावा ग्रामीण क्षेत्र से युवाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लियाथा सबके मन पर स्वतंत्रता का स्वाद चखने की लालसा थी चाहे इसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़े ऐसे शहीदों का बलिदान सदियों तक आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा
हालात धौलपुर का आजादी के लिए विद्रोह अन्य रियासतों से अलग था क्योंकि यहां विद्रोह का नेतृत्व करने वाले एवं उसे को दबाने की कार्यवाही करने वाले बाहरी लोग भी थे जिसकी बानगी 1857 में उससमय देखीगई जब इंदौर एवं ग्वालियर के क्रांतिकारीयो ने धौलपुर में प्रवेश किया तथा धौलपुर के राजा भगवंत सिंह को घेर लिया उसकी तोपो पर कब्जा किया तथा आगरा की ओर रवाना हो गए धौलपुर विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों ने पटियाला से सेना बुलाई यह राजस्थान का एकमात्र ऐसा विद्रोह माना जाता है जिसे बाहरी सेना ने शांत किया
अब आते हैं तसीमो मैं घटी आजादी से पहले कि उस घटना की ओर जिसमें भारतीय अंग्रेजों ने आजादी के लिए आंदोलन कर रहे दो युवकों को महज इसलिएगोली मार दी कि यह आजादी के दीवाने तिरंगा लगाकर एक सभा कर रहे थे
घटना 11 अप्रैल 1947 की है जब प्रजामंडल नामक संगठन बनाकर आंदोलनकारी आंदोलन को नई ऊर्जा एवं नई धार देने के लिए जगह-जगह सभाएं कर रहे थे यह वही समय था जब महात्मा गांधी एवं जवाहरलाल नेहरू आजादी के आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए पुरजोर कोशिशें में लगे हुए थे आंदोलनकारीयो द्वारा तसीमो गांव में नीम के पेड़ के नीचे आसपास के कई गांव के लोगों को सभा की जानकारी दे दी गई थी जिसमें
बीधौरा कानगला टहरी का पुरा बसई नवाब बाड़ी सर मथुरा सहित जिले भर से कार्यकर्ताओं को इकट्ठा किए जाने की सूचना भेजीगई इस दौरान जहां भी तिरंगा झंडा लगाया जाता अंग्रेजी हुकूमत तुरंत झंडे को हटवा देती तथा तरंग झंडा देखकर होना घबराहट होने लगती अब वह दिन आया 11 अप्रैल 1947 जब नीम के पेड़ के नीचे आंदोलनकारी अपनी-अपनी भूमिका तयकर रहे थे जिसकी सूचना मुखबिरी द्वारा ऊपर तक पहुंचाई गई तत्काल मजिस्ट्रेट शमशेर सिंह पुलिस उपाधीक्षक गुरुदत्त सिंह एवं थानेदारअली आजम को सभा स्थल पर भेजा गया जहां नीम के पेड़ के ऊपर तिरंगा शान से फहरा रहा था सभा स्थल पर पहुंचते ही इन्होंने उपस्थित आंदोलनकारीयो को पहले डराया धमकाया फिर तिरंगे को नीचे उतारने को कहा किंतु आंदोलनकारीयो में तसीमों के छतर सिंह ने इसका पुरजोर जो तरीके से विरोध किया जिसकी कीमत उन्हें अंग्रेजों की गोली खाकर शहीद होकर चुकानी पड़ी जब पंचम सिंह ने देखा तो उन्होंने भी तिरंगा झंडा उतारने का विरोध किया उन्हें भी गोली मारकर शहीद कर दिया गया यह सूचना चारों ओर फैल गई तथा पंडित जवाहरलाल नेहरू को जब पता चली तो उन्होंने इस घटना की निंदा की यह समाचार उस समय सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं विश्वसनीय माने जाने वाले ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित किया गया इन दोनों शहीदों की शहादत को प्रतिवर्ष मना कर उनसे युवा पीढ़ी प्रेरणा लेती है तथा आजादी के लिए अपने प्राणियों की आहुति देने वाले इन वीरों को याद करती है सरकार द्वारा तसीमो के राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल का नामकरण शहीद छतर सिंहपंचम सिंह केनाम पर कर दिया गया है
धौलपुर विधायक शोभा रानी कुशवाहा द्वारा शहीदों की स्मृति में स्मृति स्तंभ बनवाने के लिए दसलाख रुपए विधायक निधि से स्वीकृत किए थे जिसका निर्माण मंजरी फाउंडेशन द्वारा कराया गया है किंतु नामकरण एवं स्तंभ बनवाने से नहीं उनकी शहादत तब सफल मानी जाएगी जब युवा पीढ़ी पुष्प की अभिलाषा मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर तुम देना फेंक। मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जाते बीर अनेक।। की तरह देश प्रेम की भावना से शिक्षा ग्रहण करेगी
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